यह एक ऐसी दुनिया है जहाँ लोग पाखंडी हैं। हम नौटंकी करते हैं, दोस्त, परिवार और रिश्तेदार बनने-रहने की। यह नाटक कब तक चलता है, यह पात्रों पर निर्भर करता है। यहाँ हर प्रकार का नाटक मिलेगा और हर तरह के पात्र भी। माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी, मामा-मामी, चाचा-चाची... यहाँ तक कि हर किस्म के दोस्त भी मिलते हैं—पक्के दोस्त, कच्चे दोस्त, स्कूल वाले दोस्त, कॉलेज वाले दोस्त, ऑफिस वाले दोस्त, हर तरह के दोस्त। बस ध्यान रहे, इस नौटंकी में वे लोग नहीं मिलेंगे जो नाटक करना पसंद नहीं करते, जिन्होंने रिश्तेदार, परिवार, दोस्त या हमदर्द का किरदार निभाने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि अगर इंसानियत हो, तो नौटंकी में वक्त बर्बाद नहीं करना पड़ता। यदि आप गलती से इस नाटक को सच मान लें और उन पात्रों पर भरोसा कर बैठें, तो यह नाटक आपको मुँह के बल गिराकर याद दिलाता है, “देखो, ज्यादा गले मत पड़ो। नाटक है, नाटक! हमसे प्यार, भरोसा या मदद की उम्मीद मत करना। समझे, वरना सीधे नौटंकी से बाहर कर देंगे।” आवारा बादल
पुणे रेप केस ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है खुद से झूठ बोलना बंद कीजिए। कोई देश नहीं कांपता, कोई देश नहीं हिलता। पीड़िता के माता-पिता, करीबी लोगों और कुछ उन परिवारों व महिलाओं के अलावा, जिन्होंने इस दुख और हैवानियत का सामना किया है, शायद ही किसी को फर्क पड़ता है कि किसी बच्ची या महिला के साथ बलात्कार हुआ है। शायद किसी का रेप होना अब आम बात हो गई है। अगर ऐसा नहीं होता, तो हर दिन बलात्कार की घटनाएं नहीं होतीं और हर साल एक-दो ऐसे मामले सामने नहीं आते, जिनके बारे में लोग कहते हैं कि इस रेप केस ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है, और फिर भूल जाते हैं। अगर सचमुच देश हिल उठता है, तो फिर क्यों निर्भया, अरियालुर गैंग रेप, उन्नाव रेप केस, हैदराबाद रेप, हाथरस रेप, कोलकाता रेप जैसे मामले बार-बार सामने आते रहते हैं? यह सोचने की बात है कि हम तभी जागते हैं, जब कोई ऐसा रेप केस आता है, जिसे लोग अपने स्टेटस पर लगा सकें, मोमबत्ती जला सकें, मार्च निकाल सकें। हम उन लोगों की बात क्यों नहीं करते, जिनके साथ हर रोज़ अनगिनत महिलाओं के साथ दुष्कर्म होता है, जिसका हमें पता तक नहीं चलता? ऐसी खबरें खबारों में क...