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 पुणे रेप केस ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है


खुद से झूठ बोलना बंद कीजिए। कोई देश नहीं कांपता, कोई देश नहीं हिलता। पीड़िता के माता-पिता, करीबी लोगों और कुछ उन परिवारों व महिलाओं के अलावा, जिन्होंने इस दुख और हैवानियत का सामना किया है, शायद ही किसी को फर्क पड़ता है कि किसी बच्ची या महिला के साथ बलात्कार हुआ है।


शायद किसी का रेप होना अब आम बात हो गई है। अगर ऐसा नहीं होता, तो हर दिन बलात्कार की घटनाएं नहीं होतीं और हर साल एक-दो ऐसे मामले सामने नहीं आते, जिनके बारे में लोग कहते हैं कि इस रेप केस ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है, और फिर भूल जाते हैं।


अगर सचमुच देश हिल उठता है, तो फिर क्यों निर्भया, अरियालुर गैंग रेप, उन्नाव रेप केस, हैदराबाद रेप, हाथरस रेप, कोलकाता रेप जैसे मामले बार-बार सामने आते रहते हैं? यह सोचने की बात है कि हम तभी जागते हैं, जब कोई ऐसा रेप केस आता है, जिसे लोग अपने स्टेटस पर लगा सकें, मोमबत्ती जला सकें, मार्च निकाल सकें। हम उन लोगों की बात क्यों नहीं करते, जिनके साथ हर रोज़ अनगिनत महिलाओं के साथ दुष्कर्म होता है, जिसका हमें पता तक नहीं चलता? ऐसी खबरें खबारों में कुछ सेकंड की सुर्खी बनकर रह जाती हैं। निर्भया के बाद कहा गया था कि ऐसे कदम उठाए जाएंगे कि कोई भी किसी लड़की की ओर आंख उठाकर भी नहीं देखेगा, लेकिन यहां तो बलात्कार के मामले और बढ़ गए हैं।


जब बात दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की आती है, तो वह नहीं मिलती। कार्रवाई की बात हो, तो तारीखें चलती रहती हैं। कई मामले पुलिस तक नहीं पहुंचते, और जब पहुंचते हैं, तो दर्ज नहीं होते। कुछ मामलों में तो पुलिसवाले ही दुष्कर्म में शामिल हो जाते हैं। अंत में, न तो पीड़िता को न्याय मिलता है, न ही उसके परिवार को। जो मिलता है, वह है अपमान, सवाल, और एक सुर्खी— "रेप केस ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है।"

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