उसकी हिम्मत, परंपराओं को चुनौती अंबिका की माँ ने उसे समझाया था, बेटी, जब औरत को मासिक धर्म होता है, तो वो अशुद्ध हो जाती है। इस दौरान न मंदिर जाना, न पूजा-पाठ में हिस्सा लेना, और न ही कोई पवित्र चीज़ छूना। अगर ऐसा किया, तो सब कुछ खंडित हो जाता है, फिर उसे दोबारा शुद्ध करना पड़ता है। ये बातें उस दिन माँ ने कही थीं, जब अंबिका को पहली बार मासिक धर्म हुआ। लेकिन अंबिका का मन इन बातों को मानने को तैयार नहीं था। वो सोच में डूब गई। ये सब क्या है? ये नियम-कायदे, ये अशुद्धि की बातें? हमारे यहाँ इतने सारे देवी-देवता हैं। माँ दुर्गा, माँ काली, माँ सरस्वती... क्या उन्हें भी मासिक धर्म नहीं होता होगा? और अगर होता है, तो वो अशुद्ध कैसे हो सकती हैं? फिर हर औरत को तो ये होता है। जो नहीं होता, उसे तो लोग अभागी कहते हैं। फिर ये अशुद्धि कहाँ से आ गई? इन सवालों में उलझी अंबिका का दिल बेकरार था। उसे ये सब बेतुका लगता था। एक दिन, मासिक धर्म के दौरान, उसने ठान लिया कि वो मंदिर जाएगी। शायद वहाँ उसे अपने सवालों के जवाब मिलें। वो चुपके से मंदिर पहुँच गई। मंदिर की शांति में उसे सुकून मिला, लेकिन जब वो बाहर ...
मैं कहानियाँ लिखती हूँ, कविताएँ रचती हूँ, और उन सच्चाइयों को उजागर करने की कोशिश करती हूँ जो हमारे भीतर मौजूद हैं, जो समाज में हैं, पर जिन्हें हम देख नहीं पाते या देखना नहीं चाहते। किसी भी सकारात्मक बदलाव की शुरुआत सच को समझने और उसे स्वीकारने से होती है। इसके बाद ही एक नई शुरुआत संभव है। मैं यहां वही करने का प्रयास कर रही हूँ। मैं लिख रही हूँ, क्योंकि मेरे लिए लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि सच को जीने और व्यक्त करने का माध्यम है। Writing is all about expressing and transforming.