जो सच न दिखाए, वही जोक अच्छा लगता है, है ना? जोकर का नाम सुनते ही दिमाग में एक तस्वीर बनती है...सफेद चेहरा, लाल नाक, रंग-बिरंगे कपड़े पहने एक शख्स, जो देखने में बड़ा बेवकूफ लगता है। वो खुद पर हंसता है, खुद का मज़ाक उड़ाता है, और लोग उसे देखकर ठहाके लगाते हैं। यहाँ लोग अपने आप को थोड़ा अलग, थोड़ा बेहतर, थोड़ा समझदार समझते थे, और सामने वाले जोकर को बेवकूफ कहकर मज़े लेते थे। फिर वक्त बदला, और जोकर का नया अवतार आया। इस बार न सफेद चेहरा, न लाल नाक, न रंग-बिरंगे कपड़े। ये नया जोकर तो बिल्कुल अपनी ऑडियंस जैसा दिखता है...आम इंसान। हंसाने का तरीका भी अलग। ये मुद्दों की बात करता है, रोज़मर्रा की बात करता है, दुनिया-जहान की बात करता है, यहाँ तक कि राजनीति की बात करके भी हंसाता है। कभी-कभी तो लोगों को उनकी औकात भी याद दिला देता है। अब लोगों को मज़ा भी आता है, पर बुरा भी लगता है। कुछ बोलते हैं, “अरे, एक तो तुम जोकर हो, ऊपर से हमारे जैसे दिखने की कोशिश करते हो, फिर हमारे ही बारे में मज़ाक बनाते हो? हम नहीं सहेंगे!” लोग अब छोटी-छोटी बातों से आहत होने लगे हैं...या यूँ कहें, सच से। क्योंकि सच कड़व...
मैं कहानियाँ लिखती हूँ, कविताएँ रचती हूँ, और उन सच्चाइयों को उजागर करने की कोशिश करती हूँ जो हमारे भीतर मौजूद हैं, जो समाज में हैं, पर जिन्हें हम देख नहीं पाते या देखना नहीं चाहते। किसी भी सकारात्मक बदलाव की शुरुआत सच को समझने और उसे स्वीकारने से होती है। इसके बाद ही एक नई शुरुआत संभव है। मैं यहां वही करने का प्रयास कर रही हूँ। मैं लिख रही हूँ, क्योंकि मेरे लिए लिखना केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि सच को जीने और व्यक्त करने का माध्यम है। Writing is all about expressing and transforming.