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फ़रवरी, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रैना के शो और रणवीर अल्लाहबादिया के बेतुके जोक्स पर हंगामा, गंभीर मुद्दे फिर हाशिए पर

  यह सारा बवाल रैना के शो और रणवीर इलाहाबादिया के बेतुके, नैतिकताहीन चुटकुलों की वजह से हो रहा है, मानो पूरा देश इस मुद्दे पर अड़ा हुआ है। जिस तरह से राजनेता, मुख्यधारा का मीडिया और तथाकथित प्रभावशाली लोग इस मामले को इतना महत्व दे रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि अगर कोई वाकई किसी मामले, मुद्दे या अपराध पर सरकार, राजनेताओं या मुख्यधारा के मीडिया का ध्यान आकर्षित करना चाहता है, तो उन्हें बस YouTube वीडियो में एक बेकार, बेतुका चुटकुला सुनाना है। क्योंकि हम जो विरोध प्रदर्शन करते हैं, जो आंसू बहाते हैं और न्याय और सुनवाई के लिए जो दलीलें देते हैं, उनसे कभी कोई फर्क नहीं पड़ता। All of this chaos is happening because of Raina’s show and Ranveer Allahbadia’s unfunny, morally lacking jokes, as if the entire country is fixated on this issue. The way politicians, mainstream media, and so-called influential people are giving so much importance to this matter makes it seem like if someone really wants the government's, politicians', or mainstream media’s attention on a case, issue, or crime, ...

सुरक्षा, सम्मान और शौचालय - कलावती देवी और सुनीता देवी बनी "स्वच्छता योद्धा"

  शौचालय एक अच्छे और स्वच्छ समाज की बुनयादी ज़रूरत है। यह ज़रूरत अति आवश्यक हो जाती है जब बात महिलाओं पर आती है। जिस जगह शौचालय नहीं होते , वहाँ महिलाओं के साथ होने वाले अपराध जोर पकड़ लेते हैं। जिससे बचने के लिए महिलाएं "शौच के लिए भोर में सबसे पहले जाना , अकेली शौच के लिए न जाने" जैसे उपाए अपनाती हैं। इतनी सतर्कता बरतने के बाद भी वो अक्सर किसी न किसी के मैले विचारों की शिकार हो ही जाती हैं। यदि वह इससे बच भी जाएं , परन्तु खुले में शौच करने से और गन्दगी से होनी वाली बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। जिस पर उत्तर प्रदेश की " कलावती देवी " और झारखण्ड की " सुनीता देवी" ने ध्यान दिया। इन महिलाओं ने स्वच्छता जागरूता और शौचालय निर्माण के लिए लड़ाई लड़ी और स्वच्छता योद्धा बनी।   शौचालय एक जंग जब शौचालय जैसी बुनियादी ज़रूरत न मिले तब एक जंग की शुरुआत होती है। फिर यह जंग शौचालय तक सीमित नहीं रहती। यह जंग होती है महिलाओं के न्याय , उनके अधिकार , सुरक्षा और स्वच्छता के लिए।   कलावती देवी कलावती देवी का जन्म 1965 में एक राजमिस्त्री के घर हुआ था। कलावती की शादी...

हिंदू धर्म की परिभाषा: क्या सिर्फ पूजा-पाठ काफी है?

  भारत देश का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू धर्म को मानता है। भारत की जनसंख्या लगभग 140 करोड़ से अधिक है, जिसमें से लगभग 79.8% लोग हिंदू हैं। हिन्दू धर्म बस पाठ- पूजा तक सिमित नहीं है, बल्कि हिन्दू धर्म इससे कई ज़्यादा है। हिन्दू धर्म के अनुसार एक सच्चा हिन्दू वही होता है जो कर्तव्य ,सचाई ,अहिंसा और करुणा जैसे मूल सिद्धांतों को अपनाता है, और अपना सारा जीवन इसके अनुसार ही बीताता है। आज के हिन्दू ऊपर लिखी सारी बातें किसी कहानी सी लगती हैं जिसे इस दुनियाँ में बेहद ही कम लोग जी रहे हैं। जब आपके सामने कुछ ऐसी खबरें सामने आती है जिसमें लोग अपने आपको हिन्दू धर्म के रक्षक कहते दिखते होंगे, स्कूल में छोटे बच्चों को क्रिसमस मनाने से रोकते दिखाई देते होंगे, कुछ मुस्लिम बच्चों को ज़बरन राम राम कहलवाते दिखाई देते होंगे। यह कुछ ऐसे गलत कर्म हैं जो हिन्दू के मूल सिद्धांतो से दूर-दूर तक मेल नहीं खाते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या इन व्यक्तिओं को हिन्दू कहलाने का हक़ है। धर्म गुरु का ट्रेंड हर धर्म में “धर्म गुरु” भी एक अहम भूमिका निभाते हैं, जब व्यक्ति स्वयं अपने सवालों व कष्टो का हल नहीं खोज पाता है तब वह ...

ख्वाबों का खौफ़: एक कहानी

ओह नो, फिर से वो अजीब बेकार सपना! मैं थक गई हूँ इससे, किसी को बता भी नहीं सकती। हाँ, बताऊँगी भी क्या कि मुझे अक्सर सपने आते हैं जिनसे मुझे डर लगता है, इतना डर कि कभी-कभी ना सोना ही बेहतर लगता है। (Alarm Clock rings) शालिनी अलार्म बंद करते हुए बोलती है… क्यों ही अलार्म सेट करती हूँ जब उठ इसके बजने से पहले ही जाती हूँ, खैर चलो तैयार हो जाएँ वरना फिर किट किट। {शालिनी का छोटा सा परिचय} शालिनी एक सिंगल 26 साल की लड़की है जो दिल्ली में अकेली रहती है, एक पीजी में। वैसे तो उसका घर भोपाल में है, एक बड़ा घर जहाँ उसकी ज्वाइंट फैमिली रहती है। शालिनी एक ग्राफिक डिजाइनर है और मल्टीमीडिया कंपनी में काम करती है। शालिनी ऑफिस पहुँचती है। “हाय-हेलो, गुड मॉर्निंग” की सीढ़ी पार करके वो अपने डेस्क पर जा बैठती है, लॉग इन करती है, कुछ मेल चेक करती है, क्लाइंट्स के फीडबैक पढ़ के बाकी अपने काम में लग जाती है। शाम 6 बजे करेक्ट उसका लॉगआउट हो जाता है, ना एक मिनट आगे ना एक मिनट पीछे। फिर वो अपने घर जाती है, अपने लिए कुक करती है, और बुक लेकर बैठ जाती है। वो देर रात तक किताब पढ़ती रहती है, बस इसलिए क्योंकि उसे सोने ...

स्वर्ग का सपना और समाज की सच्चाई

  एक गांव था जिसका नाम आनंदपूरा था। इस गांव में दो प्रकार के लोग रहते थे। एक समूह था अंशुमाली और दूसरा समूह था उदक। सभी लोग खुशहाल और अच्छे से रहते थे। लेकिन एक दिन अंशुमाली समूह के एक आदमी, अजय, का अपने घर में झगड़ा हो गया। उसके बच्चों ने उसका साथ नहीं दिया और अपनी मां का साथ दिया, क्योंकि गलती अजय की थी। अजय गुस्से में घर से बाहर चला जाता है और अकेले बैठकर बहुत सोचता है। वह सोचता है कि "क्या सोचते हैं लोग, मैं मर्द हूं, तो सबको मेरी सुननी चाहिए।" फिर उसे एक विचार आता है कि क्यों न एक ऐसी किताब बनाई जाए, जिसमें औरतों को उनकी औकात पता चले, और उसमें सभी नियम लिखे जाएं कि कौन, कब, क्या करेगा, किसका क्या धर्म होगा। इस किताब में पुरुषों को सर्वोत्तम बताया जाए, और औरतों के लिए सिर्फ घर के काम, शारीरिक सुख, बच्चे पैदा करना और चुपचाप रहना लिखा जाए। अजय का एक दोस्त भी था, सुहान, जो कहता है, "ऐसा करो, हम सबके लिए एक पैटर्न बना देते हैं, जिससे सब नियमों के तहत चले और डिसिप्लिन हो जाएं।" फिर उन्होंने एक किताब लिखी और एक दिन बैठक में सबको बताया कि उनके एक बड़े आदमी ने यह किताब ...

आवाज़ उठाओ: एकजुट होकर -एक साथ, महिलाओं के हो रहे "आँखों से बलात्कार" पर रोक लगाओ

आँखों से बलात्कार का शिकार महिलाएँ प्रति दिन होती हैं। यह इतनी आम बात बन गई है कि लोग इस पर चर्चा तक नहीं करते। परन्तु यह कितना घातक है यह केवल एक महिला ही बता सकती है। विद्यालय, दफ्तर और रोज़मर्रा के काम के लिए बाहर निकलने वाली महिलाएँ रोजाना आँखों से बलात्कार का सामना करती हैं। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जिनका मानना है कि महिला को देख भर लेने से कुछ नहीं बिगड़ता, और इस मानसिकता के साथ वह सड़क पर चलने वाली हर महिला पर ऑंखें गड़ाएं घूरते रहते हैं। यहाँ बात ख़त्म नहीं होती.... घूरने से शुरू होकर वह अश्लील इशारे, अभद्र टिप्पणी और महिला का पीछा तक करते हैं। इन घटनाओं का महिलाओं के काम, पढ़ाई, और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है। फिर क्यों है यह एक आम बात ? पितृसत्ता समाज में महिलाओं को आज भी पुरषों से कम समझा जाता है। जिस कारण कुछ घृणित विचार वाले पुरुष खुद को महिला को परेशान करने का हकदार समझते हैं। शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण लोग सहमति और सम्मान का अर्थ नहीं समझते। महिला पर हावी होने को कुछ लोग मर्दानगी कहते हैं। जब बचपन में लड़कों को महिला का सम्मान करना नहीं सीखाया जाता, तब वह बड़े ...