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आवाज़ उठाओ: एकजुट होकर -एक साथ, महिलाओं के हो रहे "आँखों से बलात्कार" पर रोक लगाओ




आँखों से बलात्कार का शिकार महिलाएँ प्रति दिन होती हैं। यह इतनी आम बात बन गई है कि लोग इस पर चर्चा तक नहीं करते। परन्तु यह कितना घातक है यह केवल एक महिला ही बता सकती है। विद्यालय, दफ्तर और रोज़मर्रा के काम के लिए बाहर निकलने वाली महिलाएँ रोजाना आँखों से बलात्कार का सामना करती हैं। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जिनका मानना है कि महिला को देख भर लेने से कुछ नहीं बिगड़ता, और इस मानसिकता के साथ वह सड़क पर चलने वाली हर महिला पर ऑंखें गड़ाएं घूरते रहते हैं। यहाँ बात ख़त्म नहीं होती.... घूरने से शुरू होकर वह अश्लील इशारे, अभद्र टिप्पणी और महिला का पीछा तक करते हैं। इन घटनाओं का महिलाओं के काम, पढ़ाई, और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है।

फिर क्यों है यह एक आम बात ?

पितृसत्ता समाज में महिलाओं को आज भी पुरषों से कम समझा जाता है। जिस कारण कुछ घृणित विचार वाले पुरुष खुद को महिला को परेशान करने का हकदार समझते हैं। शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण लोग सहमति और सम्मान का अर्थ नहीं समझते। महिला पर हावी होने को कुछ लोग मर्दानगी कहते हैं। जब बचपन में लड़कों को महिला का सम्मान करना नहीं सीखाया जाता, तब वह बड़े हो कर गलत और घृणित व्यवहार करते हैं। इस समाज में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार सदियों से होता आया है और हो रहा हैं।

सड़क पर चलती महिला

1. खुशी अपनी पढ़ाई और नौकरी के लिए भोपाल में रहती है। वह बताती है, एक दिन जब वह अपने विश्वविद्यालय जा रही थी तब एक आदमी उनका पीछा करने लगा। कुछ ही पल में उसने खुशी को अश्लील इशारे करने शुरू कर दिए और अपने हाथों को निजी अंग पर रख कर टिपण्णी की। खुशी को इस घटना ने डरा के रख दिया।

2. दिल्ली की प्रियंका एक रात दफ्तर से घर जाने के लिए बस लेती है। बस में एक पुरुष उनके साथ वाली सीट पर बैठ जाता है। बस चलने के कुछ देर बाद ही प्रियंका का ध्यान पुरुष की ओर जाता है। वह देखती हैं कि वह आदमी हस्तमैथुन (मास्टरबेट) कर रहा है। उन्हें डर लगा पर वह चुप नही रही और बस रुकवा के उस आदमी पर चिल्लाने लगीं। बस में मौजूद अन्य लोगों को भी उसके बारे में बताया, लेकिन अफसोस वह आदमी भाग निकला, बस में बैठे किसी व्यक्ति, ड्राइवर और कंडक्‍टर ने कुछ नहीं किया।

खुशी और प्रियंका की आपबीती सवाल खड़े करते हैं। समाज में सुरक्षा, सम्मान और महिलाओं की परिस्थितयों पर।

देश में हर साल बलात्कार के लगभग 30,000 मामले

बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसी खबरें जब भी सुर्खियों में आती हैं, तब इंसानियत से भरोसा उठा देने वाला 2012 का उदाहरण सामने आ जाता है। 22 वर्षीय निर्भया के साथ क्रूरतापूर्वक बलात्कार किया गया। उनकी स्थिती इतनी भयानक थीं कि दो सप्ताह के बाद उनकी मृत्यु हो गई। पूरे देश में व्यापक प्रदर्शन शुरू हो गए। इसके बाद भी बलात्कार के मामले बढ़ते रहे। 2024 में कोलकाता की पोस्ट-ग्रेजुएट महिला ट्रेनी डॉक्टर के साथ क्रूरतापूर्वक बलात्कार कर के उनकी हत्या कर दी गई।

2012 के बाद से देश में हर साल लगभग 30,000 मामले दर्ज होते है। 2016 में ये संख्या लगभग 39,000 मामलो के साथ चरम पर थी। 2022 की रिपोर्ट के अनुसार संख्या लगभग 31,500 तक हुई। परन्तु ये संख्या इससे अधिक हो सकती है। यौन हिंसा से जुड़े कलंक और पुलिस व न्याय व्यवस्ता में विश्वास की कमी के कारण मामले दर्ज नहीं किए जाते हैं।

महिला कोई वस्तु नहीं

पितृसत्ता समाज महिला को एक वस्तु के रूप में देखता है। वह मानते हैं कि शादी से पहले पिता, भाई और शादी के बाद पति की आज्ञा का पालन करना ही महिला का धर्म है। समाज में बदलाव लाना ज़रूरी है। महिला किसी की गुलाम नहीं है, बराबरी की हकदार है। इसलिए समाज से पितृसत्ता और रूढ़िवादी परम्पराओं को जड़ से खत्म करना होगा।

आवाज़ उठाओ

सभी महिलाओं को अपने लिए आवाज़ उठानी होगी। जब कोई तुम्हें घूरे, अश्लील इशारे, अभद्र टिपण्णी और पीछा करे तो तुम नज़र मत फेरना - डटकर सामना करो और आवाज़ उठाओ। किसी और महिला के साथ कुछ गलत होता देखो तब भी आवाज़ उठाओ। यदि तुमने आज कुछ नहीं किया तो कल वो दुबारा आएगा और तुम्हें दुगनी तकलीफ पहुँचाएगा। महिलाएँ अपनी सुरक्षा और सम्मान के लिए इतिहासकाल से लड़ती आई हैं, और लड़ती रहेंगी "एकजुट होकर - एक साथ"।


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