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ख्वाबों का खौफ़: एक कहानी




ओह नो, फिर से वो अजीब बेकार सपना! मैं थक गई हूँ इससे, किसी को बता भी नहीं सकती। हाँ, बताऊँगी भी क्या कि मुझे अक्सर सपने आते हैं जिनसे मुझे डर लगता है, इतना डर कि कभी-कभी ना सोना ही बेहतर लगता है।

(Alarm Clock rings) शालिनी अलार्म बंद करते हुए बोलती है…

क्यों ही अलार्म सेट करती हूँ जब उठ इसके बजने से पहले ही जाती हूँ, खैर चलो तैयार हो जाएँ वरना फिर किट किट।

{शालिनी का छोटा सा परिचय}

शालिनी एक सिंगल 26 साल की लड़की है जो दिल्ली में अकेली रहती है, एक पीजी में। वैसे तो उसका घर भोपाल में है, एक बड़ा घर जहाँ उसकी ज्वाइंट फैमिली रहती है। शालिनी एक ग्राफिक डिजाइनर है और मल्टीमीडिया कंपनी में काम करती है।

शालिनी ऑफिस पहुँचती है। “हाय-हेलो, गुड मॉर्निंग” की सीढ़ी पार करके वो अपने डेस्क पर जा बैठती है, लॉग इन करती है, कुछ मेल चेक करती है, क्लाइंट्स के फीडबैक पढ़ के बाकी अपने काम में लग जाती है। शाम 6 बजे करेक्ट उसका लॉगआउट हो जाता है, ना एक मिनट आगे ना एक मिनट पीछे। फिर वो अपने घर जाती है, अपने लिए कुक करती है, और बुक लेकर बैठ जाती है। वो देर रात तक किताब पढ़ती रहती है, बस इसलिए क्योंकि उसे सोने से डर लगता है। उसे डर लगता है कि अगर वो सोई तो उसे दुबारा वो डरावने सपने आएँगे। सुबह होते ही दुबारा वही रूटीन होता है। शालिनी की लाइफ में कुछ खास नहीं था, वो बस यही रूटीन को अपनी ज़िंदगी मानती थी।

हमेशा की तरह ही आज भी शालिनी ऑफिस आती है, लॉग इन करती है और अपना काम कर रही होती है कि उसे एक आवाज़ आती है, “हेल्लो”। शालिनी अपने साथ वाले डेस्क की ओर देखती है और पाती है एक नया चेहरा।

नया चेहरा: “हेल्लो, मेरा नाम नीरज है, आज ही मैंने ज्वाइन किया।”

शालिनी: “हेल्लो।”

नीरज: “आपका शुभ नाम, if you don’t mind?”

शालिनी: “मेरा नाम शालिनी है।”

शालिनी अपना नाम बता कर फिर अपने काम में लग जाती है।

कुछ महीने बीतने के बाद शालिनी को लगता है कि नीरज हमेशा उससे बात करने के बहाने खोजता रहता है और आज तो संडे है पर फिर भी काम के बहाने उसने मिलने को बोल दिया  है वो भी उस बेकार से कैफे में। वो जाती नहीं अगर उसके बॉस ने कल ही रिपोर्ट न मांगी होती।

खैर, शालिनी एक वाइट एंड रेड कलर की कुर्ती पहने कैफे पहुँच जाती है। दोनों मिलते हैं, बैठ कर अपने काम में लग जाते हैं। नीरज बीच-बीच में काम से हट कर बात करने की कोशिश करता है पर शालिनी इग्नोर करती है। कब टाइम निकल जाता है पता ही नहीं चलता। रात के 11:25 हो रहे थे, शालिनी कहती है:

शालिनी: “काफी लेट हो गया है, मुझे निकलना चाहिए।”

नीरज: “हाँ, क्यों नहीं, मैं आपको छोड़ दूँगा।”

शालिनी: “नहीं, नहीं, मैं चली जाऊँगी, आप परेशान न हों।”

नीरज: “अरे, परेशानी की क्या बात है, मेरा घर भी उसी रास्ते पर है, आइए भी अब।”

शालिनी बहुत कोशिश करती है मना करने की पर जीत नीरज की ही होती है। दोनों जाकर कार में बैठ जाते हैं, नीरज कार चला रहा होता है और शालिनी से बात करने की कोशिश करता है। शालिनी ना उस पर ना उसकी बात पर ध्यान दे रही थी, वो बस कार की विंडो से बाहर देख रही थी। तभी उसे अचानक महसूस होता है कि उसकी  Thigh पर नीरज अपना हाथ रख रहा है। वो हकबका जाती है और कहती है, “ये क्या कर रहे हैं आप?”

नीरज कुतुब मीनार मेट्रो स्टेशन के पास जैन मंदिर रोड पर कार रोक लेता है जहाँ कोई नहीं होता है, सब सुनसान होता है। नीरज शालिनी की ओर बढ़ता है। शालिनी उसे रुकने को बोलती रहती है और सीट बेल्ट खोल के जल्दी से कार से नीचे उतर जाती है। नीरज उसके पीछे-पीछे जाता है और बोलता है, “तुम कमाल हो, इतनी सुंदर हो और क्या फिगर है तुम्हारा, और तुम इसको इन ढीले-ढाले कपड़ों के पीछे छुपा के रखती हो। तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं रहा है, तुमने कभी एक मर्द के प्यार को महसूस ही नहीं किया है। आओ, आज मैं तुम्हें वो प्यार देता हूँ। मैं इतने महीने से कोशिश कर रहा था तुम्हें प्यार करने की।”

शालिनी डर से काँप रही थी और पीछे-पीछे हो रही थी। तभी महसूस करती है कि उसके पीछे दीवार आ गई है, रास्ता खत्म है अब। नीरज उसे दबोचने को टूट पड़ता है उसके ऊपर। शालिनी अपने हाथ-पैर चला रही थी, बचने की कोशिश करते-करते उसके हाथ एक टूटी बियर की बॉटल लगती है। शालिनी बिना किसी सेकंड थॉट के वो बियर बोतल उस पर चला देती है जो नीरज की गर्दन पर जाकर लगती है और नीरज अपने गर्दन को पकड़ के नीचे गिर जाता है  कुछ ही सेकंड में नीरज की मौत हो जाती है। शालिनी भी बेहोश हो जाती है।

शालिनी डर में उठती है और कहती है, “फिर वही डरावना सपना!” कुछ ही देर में 6 बजे का अलार्म बजता है।


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